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Para 30

Sipara 30 of 30

564 Ayahs

An-Naba
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ عَمَّ يَتَسَآءَلُونَ

ये लोग आपस में किस चीज़ का हाल पूछते हैं

2

عَنِ ٱلنَّبَإِ ٱلْعَظِيمِ

एक बड़ी ख़बर का हाल

3

ٱلَّذِى هُمْ فِيهِ مُخْتَلِفُونَ

जिसमें लोग एख्तेलाफ कर रहे हैं

4

كَلَّا سَيَعْلَمُونَ

देखो उन्हें अनक़रीब ही मालूम हो जाएगा

5

ثُمَّ كَلَّا سَيَعْلَمُونَ

फिर इन्हें अनक़रीब ही ज़रूर मालूम हो जाएगा

6

أَلَمْ نَجْعَلِ ٱلْأَرْضَ مِهَٰدًۭا

क्या हमने ज़मीन को बिछौना

7

وَٱلْجِبَالَ أَوْتَادًۭا

और पहाड़ों को (ज़मीन) की मेख़े नहीं बनाया

8

وَخَلَقْنَٰكُمْ أَزْوَٰجًۭا

और हमने तुम लोगों को जोड़ा जोड़ा पैदा किया

9

وَجَعَلْنَا نَوْمَكُمْ سُبَاتًۭا

और तुम्हारी नींद को आराम (का बाइस) क़रार दिया

10

وَجَعَلْنَا ٱلَّيْلَ لِبَاسًۭا

और रात को परदा बनाया

11

وَجَعَلْنَا ٱلنَّهَارَ مَعَاشًۭا

और हम ही ने दिन को (कसब) मआश (का वक्त) बनाया

12

وَبَنَيْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعًۭا شِدَادًۭا

और तुम्हारे ऊपर सात मज़बूत (आसमान) बनाए

13

وَجَعَلْنَا سِرَاجًۭا وَهَّاجًۭا

और हम ही ने (सूरज) को रौशन चिराग़ बनाया

14

وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلْمُعْصِرَٰتِ مَآءًۭ ثَجَّاجًۭا

और हम ही ने बादलों से मूसलाधार पानी बरसाया

15

لِّنُخْرِجَ بِهِۦ حَبًّۭا وَنَبَاتًۭا

ताकि उसके ज़रिए से दाने और सबज़ी

16

وَجَنَّٰتٍ أَلْفَافًا

और घने घने बाग़ पैदा करें

17

إِنَّ يَوْمَ ٱلْفَصْلِ كَانَ مِيقَٰتًۭا

बेशक फैसले का दिन मुक़र्रर है

18

يَوْمَ يُنفَخُ فِى ٱلصُّورِ فَتَأْتُونَ أَفْوَاجًۭا

जिस दिन सूर फूँका जाएगा और तुम लोग गिरोह गिरोह हाज़िर होगे

19

وَفُتِحَتِ ٱلسَّمَآءُ فَكَانَتْ أَبْوَٰبًۭا

और आसमान खोल दिए जाएँगे

20

وَسُيِّرَتِ ٱلْجِبَالُ فَكَانَتْ سَرَابًا

तो (उसमें) दरवाज़े हो जाएँगे और पहाड़ (अपनी जगह से) चलाए जाएँगे तो रेत होकर रह जाएँगे

21

إِنَّ جَهَنَّمَ كَانَتْ مِرْصَادًۭا

बेशक जहन्नुम घात में है

22

لِّلطَّٰغِينَ مَـَٔابًۭا

सरकशों का (वही) ठिकाना है

23

لَّٰبِثِينَ فِيهَآ أَحْقَابًۭا

उसमें मुद्दतों पड़े झींकते रहेंगें

24

لَّا يَذُوقُونَ فِيهَا بَرْدًۭا وَلَا شَرَابًا

न वहाँ ठन्डक का मज़ा चखेंगे और न खौलते हुए पानी

25

إِلَّا حَمِيمًۭا وَغَسَّاقًۭا

और बहती हुई पीप के सिवा कुछ पीने को मिलेगा

26

جَزَآءًۭ وِفَاقًا

(ये उनकी कारस्तानियों का) पूरा पूरा बदला है

27

إِنَّهُمْ كَانُوا۟ لَا يَرْجُونَ حِسَابًۭا

बेशक ये लोग आख़ेरत के हिसाब की उम्मीद ही न रखते थे

28

وَكَذَّبُوا۟ بِـَٔايَٰتِنَا كِذَّابًۭا

और इन लोगो हमारी आयतों को बुरी तरह झुठलाया

29

وَكُلَّ شَىْءٍ أَحْصَيْنَٰهُ كِتَٰبًۭا

और हमने हर चीज़ को लिख कर मनज़बत कर रखा है

30

فَذُوقُوا۟ فَلَن نَّزِيدَكُمْ إِلَّا عَذَابًا

तो अब तुम मज़ा चखो हमतो तुम पर अज़ाब ही बढ़ाते जाएँगे

31

إِنَّ لِلْمُتَّقِينَ مَفَازًا

बेशक परहेज़गारों के लिए बड़ी कामयाबी है

32

حَدَآئِقَ وَأَعْنَٰبًۭا

(यानि बेहश्त के) बाग़ और अंगूर

33

وَكَوَاعِبَ أَتْرَابًۭا

और वह औरतें जिनकी उठती हुई जवानियाँ

34

وَكَأْسًۭا دِهَاقًۭا

और बाहम हमजोलियाँ हैं और शराब के लबरेज़ साग़र

35

لَّا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًۭا وَلَا كِذَّٰبًۭا

और शराब के लबरेज़ साग़र वहाँ न बेहूदा बात सुनेंगे और न झूठ

36

جَزَآءًۭ مِّن رَّبِّكَ عَطَآءً حِسَابًۭا

(ये) तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से काफ़ी इनाम और सिला है

37

رَّبِّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ٱلرَّحْمَٰنِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِنْهُ خِطَابًۭا

जो सारे आसमान और ज़मीन और जो इन दोनों के बीच में है सबका मालिक है बड़ा मेहरबान लोगों को उससे बात का पूरा न होगा

38

يَوْمَ يَقُومُ ٱلرُّوحُ وَٱلْمَلَٰٓئِكَةُ صَفًّۭا ۖ لَّا يَتَكَلَّمُونَ إِلَّا مَنْ أَذِنَ لَهُ ٱلرَّحْمَٰنُ وَقَالَ صَوَابًۭا

जिस दिन जिबरील और फरिश्ते (उसके सामने) पर बाँध कर खड़े होंगे (उस दिन) उससे कोई बात न कर सकेगा मगर जिसे ख़ुदा इजाज़त दे और वह ठिकाने की बात कहे

39

ذَٰلِكَ ٱلْيَوْمُ ٱلْحَقُّ ۖ فَمَن شَآءَ ٱتَّخَذَ إِلَىٰ رَبِّهِۦ مَـَٔابًا

वह दिन बरहक़ है तो जो शख़्श चाहे अपने परवरदिगार की बारगाह में (अपना) ठिकाना बनाए

40

إِنَّآ أَنذَرْنَٰكُمْ عَذَابًۭا قَرِيبًۭا يَوْمَ يَنظُرُ ٱلْمَرْءُ مَا قَدَّمَتْ يَدَاهُ وَيَقُولُ ٱلْكَافِرُ يَٰلَيْتَنِى كُنتُ تُرَٰبًۢا

हमने तुम लोगों को अनक़रीब आने वाले अज़ाब से डरा दिया जिस दिन आदमी अपने हाथों पहले से भेजे हुए (आमाल) को देखेगा और काफ़िर कहेगा काश मैं ख़ाक हो जाता

An-Naazi'aat
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلنَّٰزِعَٰتِ غَرْقًۭا

उन (फ़रिश्तों) की क़सम

2

وَٱلنَّٰشِطَٰتِ نَشْطًۭا

जो (कुफ्फ़ार की रूह) डूब कर सख्ती से खींच लेते हैं

3

وَٱلسَّٰبِحَٰتِ سَبْحًۭا

और उनकी क़सम जो (मोमिनीन की जान) आसानी से खोल देते हैं

4

فَٱلسَّٰبِقَٰتِ سَبْقًۭا

और उनकी क़सम जो (आसमान ज़मीन के दरमियान) पैरते फिरते हैं

5

فَٱلْمُدَبِّرَٰتِ أَمْرًۭا

फिर एक के आगे बढ़ते हैं

6

يَوْمَ تَرْجُفُ ٱلرَّاجِفَةُ

फिर (दुनिया के) इन्तज़ाम करते हैं (उनकी क़सम) कि क़यामत हो कर रहेगी

7

تَتْبَعُهَا ٱلرَّادِفَةُ

जिस दिन ज़मीन को भूचाल आएगा फिर उसके पीछे और ज़लज़ला आएगा

8

قُلُوبٌۭ يَوْمَئِذٍۢ وَاجِفَةٌ

उस दिन दिलों को धड़कन होगी

9

أَبْصَٰرُهَا خَٰشِعَةٌۭ

उनकी ऑंखें (निदामत से) झुकी हुई होंगी

10

يَقُولُونَ أَءِنَّا لَمَرْدُودُونَ فِى ٱلْحَافِرَةِ

कुफ्फ़ार कहते हैं कि क्या हम उलटे पाँव (ज़िन्दगी की तरफ़) फिर लौटेंगे

11

أَءِذَا كُنَّا عِظَٰمًۭا نَّخِرَةًۭ

क्या जब हम खोखल हड्डियाँ हो जाएँगे

12

قَالُوا۟ تِلْكَ إِذًۭا كَرَّةٌ خَاسِرَةٌۭ

कहते हैं कि ये लौटना तो बड़ा नुक़सान देह है

13

فَإِنَّمَا هِىَ زَجْرَةٌۭ وَٰحِدَةٌۭ

वह (क़यामत) तो (गोया) बस एक सख्त चीख़ होगी

14

فَإِذَا هُم بِٱلسَّاهِرَةِ

और लोग शक़ बारगी एक मैदान (हश्र) में मौजूद होंगे

15

هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ مُوسَىٰٓ

(ऐ रसूल) क्या तुम्हारे पास मूसा का किस्सा भी पहुँचा है

16

إِذْ نَادَىٰهُ رَبُّهُۥ بِٱلْوَادِ ٱلْمُقَدَّسِ طُوًى

जब उनको परवरदिगार ने तूवा के मैदान में पुकारा

17

ٱذْهَبْ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ إِنَّهُۥ طَغَىٰ

कि फिरऔन के पास जाओ वह सरकश हो गया है

18

فَقُلْ هَل لَّكَ إِلَىٰٓ أَن تَزَكَّىٰ

(और उससे) कहो कि क्या तेरी ख्वाहिश है कि (कुफ्र से) पाक हो जाए

19

وَأَهْدِيَكَ إِلَىٰ رَبِّكَ فَتَخْشَىٰ

और मैं तुझे तेरे परवरदिगार की राह बता दूँ तो तुझको ख़ौफ (पैदा) हो

20

فَأَرَىٰهُ ٱلْءَايَةَ ٱلْكُبْرَىٰ

ग़रज़ मूसा ने उसे (असा का बड़ा) मौजिज़ा दिखाया

21

فَكَذَّبَ وَعَصَىٰ

तो उसने झुठला दिया और न माना

22

ثُمَّ أَدْبَرَ يَسْعَىٰ

फिर पीठ फेर कर (ख़िलाफ़ की) तदबीर करने लगा

23

فَحَشَرَ فَنَادَىٰ

फिर (लोगों को) जमा किया और बुलन्द आवाज़ से चिल्लाया

24

فَقَالَ أَنَا۠ رَبُّكُمُ ٱلْأَعْلَىٰ

तो कहने लगा मैं तुम लोगों का सबसे बड़ा परवरदिगार हूँ

25

فَأَخَذَهُ ٱللَّهُ نَكَالَ ٱلْءَاخِرَةِ وَٱلْأُولَىٰٓ

तो ख़ुदा ने उसे दुनिया और आख़ेरत (दोनों) के अज़ाब में गिरफ्तार किया

26

إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَعِبْرَةًۭ لِّمَن يَخْشَىٰٓ

बेशक जो शख़्श (ख़ुदा से) डरे उसके लिए इस (किस्से) में इबरत है

27

ءَأَنتُمْ أَشَدُّ خَلْقًا أَمِ ٱلسَّمَآءُ ۚ بَنَىٰهَا

भला तुम्हारा पैदा करना ज्यादा मुश्किल है या आसमान का

28

رَفَعَ سَمْكَهَا فَسَوَّىٰهَا

कि उसी ने उसको बनाया उसकी छत को ख़ूब ऊँचा रखा

29

وَأَغْطَشَ لَيْلَهَا وَأَخْرَجَ ضُحَىٰهَا

फिर उसे दुरूस्त किया और उसकी रात को तारीक बनाया और (दिन को) उसकी धूप निकाली

30

وَٱلْأَرْضَ بَعْدَ ذَٰلِكَ دَحَىٰهَآ

और उसके बाद ज़मीन को फैलाया

31

أَخْرَجَ مِنْهَا مَآءَهَا وَمَرْعَىٰهَا

उसी में से उसका पानी और उसका चारा निकाला

32

وَٱلْجِبَالَ أَرْسَىٰهَا

और पहाड़ों को उसमें गाड़ दिया

33

مَتَٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَٰمِكُمْ

(ये सब सामान) तुम्हारे और तुम्हारे चारपायो के फ़ायदे के लिए है

34

فَإِذَا جَآءَتِ ٱلطَّآمَّةُ ٱلْكُبْرَىٰ

तो जब बड़ी सख्त मुसीबत (क़यामत) आ मौजूद होगी

35

يَوْمَ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَٰنُ مَا سَعَىٰ

जिस दिन इन्सान अपने कामों को कुछ याद करेगा

36

وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِمَن يَرَىٰ

और जहन्नुम देखने वालों के सामने ज़ाहिर कर दी जाएगी

37

فَأَمَّا مَن طَغَىٰ

तो जिसने (दुनिया में) सर उठाया था

38

وَءَاثَرَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا

और दुनियावी ज़िन्दगी को तरजीह दी थी

39

فَإِنَّ ٱلْجَحِيمَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ

उसका ठिकाना तो यक़ीनन दोज़ख़ है

40

وَأَمَّا مَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِۦ وَنَهَى ٱلنَّفْسَ عَنِ ٱلْهَوَىٰ

मगर जो शख़्श अपने परवरदिगार के सामने खड़े होने से डरता और जी को नाजायज़ ख्वाहिशों से रोकता रहा

41

فَإِنَّ ٱلْجَنَّةَ هِىَ ٱلْمَأْوَىٰ

तो उसका ठिकाना यक़ीनन बेहश्त है

42

يَسْـَٔلُونَكَ عَنِ ٱلسَّاعَةِ أَيَّانَ مُرْسَىٰهَا

(ऐ रसूल) लोग तुम से क़यामत के बारे में पूछते हैं

43

فِيمَ أَنتَ مِن ذِكْرَىٰهَآ

कि उसका कहीं थल बेड़ा भी है

44

إِلَىٰ رَبِّكَ مُنتَهَىٰهَآ

तो तुम उसके ज़िक्र से किस फ़िक्र में हो

45

إِنَّمَآ أَنتَ مُنذِرُ مَن يَخْشَىٰهَا

उस (के इल्म) की इन्तेहा तुम्हारे परवरदिगार ही तक है तो तुम बस जो उससे डरे उसको डराने वाले हो

46

كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَهَا لَمْ يَلْبَثُوٓا۟ إِلَّا عَشِيَّةً أَوْ ضُحَىٰهَا

जिस दिन वह लोग इसको देखेंगे तो (समझेंगे कि दुनिया में) बस एक शाम या सुबह ठहरे थे

Abasa
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ عَبَسَ وَتَوَلَّىٰٓ

वह अपनी बात पर चीं ब जबीं हो गया

2

أَن جَآءَهُ ٱلْأَعْمَىٰ

और मुँह फेर बैठा कि उसके पास नाबीना आ गया

3

وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّهُۥ يَزَّكَّىٰٓ

और तुमको क्या मालूम यायद वह (तालीम से) पाकीज़गी हासिल करता

4

أَوْ يَذَّكَّرُ فَتَنفَعَهُ ٱلذِّكْرَىٰٓ

या वह नसीहत सुनता तो नसीहत उसके काम आती

5

أَمَّا مَنِ ٱسْتَغْنَىٰ

तो जो कुछ परवाह नहीं करता

6

فَأَنتَ لَهُۥ تَصَدَّىٰ

उसके तो तुम दरपै हो जाते हो हालॉकि अगर वह न सुधरे

7

وَمَا عَلَيْكَ أَلَّا يَزَّكَّىٰ

तो तुम ज़िम्मेदार नहीं

8

وَأَمَّا مَن جَآءَكَ يَسْعَىٰ

और जो तुम्हारे पास लपकता हुआ आता है

9

وَهُوَ يَخْشَىٰ

और (ख़ुदा से) डरता है

10

فَأَنتَ عَنْهُ تَلَهَّىٰ

तो तुम उससे बेरूख़ी करते हो

11

كَلَّآ إِنَّهَا تَذْكِرَةٌۭ

देखो ये (क़ुरान) तो सरासर नसीहत है

12

فَمَن شَآءَ ذَكَرَهُۥ

तो जो चाहे इसे याद रखे

13

فِى صُحُفٍۢ مُّكَرَّمَةٍۢ

(लौहे महफूज़ के) बहुत मोअज़ज़िज औराक़ में (लिखा हुआ) है

14

مَّرْفُوعَةٍۢ مُّطَهَّرَةٍۭ

बुलन्द मरतबा और पाक हैं

15

بِأَيْدِى سَفَرَةٍۢ

(ऐसे) लिखने वालों के हाथों में है

16

كِرَامٍۭ بَرَرَةٍۢ

जो बुज़ुर्ग नेकोकार हैं

17

قُتِلَ ٱلْإِنسَٰنُ مَآ أَكْفَرَهُۥ

इन्सान हलाक हो जाए वह क्या कैसा नाशुक्रा है

18

مِنْ أَىِّ شَىْءٍ خَلَقَهُۥ

(ख़ुदा ने) उसे किस चीज़ से पैदा किया

19

مِن نُّطْفَةٍ خَلَقَهُۥ فَقَدَّرَهُۥ

नुत्फे से उसे पैदा किया फिर उसका अन्दाज़ा मुक़र्रर किया

20

ثُمَّ ٱلسَّبِيلَ يَسَّرَهُۥ

फिर उसका रास्ता आसान कर दिया

21

ثُمَّ أَمَاتَهُۥ فَأَقْبَرَهُۥ

फिर उसे मौत दी फिर उसे कब्र में दफ़न कराया

22

ثُمَّ إِذَا شَآءَ أَنشَرَهُۥ

फिर जब चाहेगा उठा खड़ा करेगा

23

كَلَّا لَمَّا يَقْضِ مَآ أَمَرَهُۥ

सच तो यह है कि ख़ुदा ने जो हुक्म उसे दिया उसने उसको पूरा न किया

24

فَلْيَنظُرِ ٱلْإِنسَٰنُ إِلَىٰ طَعَامِهِۦٓ

तो इन्सान को अपने घाटे ही तरफ ग़ौर करना चाहिए

25

أَنَّا صَبَبْنَا ٱلْمَآءَ صَبًّۭا

कि हम ही ने (बादल) से पानी बरसाया

26

ثُمَّ شَقَقْنَا ٱلْأَرْضَ شَقًّۭا

फिर हम ही ने ज़मीन (दरख्त उगाकर) चीरी फाड़ी

27

فَأَنۢبَتْنَا فِيهَا حَبًّۭا

फिर हमने उसमें अनाज उगाया

28

وَعِنَبًۭا وَقَضْبًۭا

और अंगूर और तरकारियाँ

29

وَزَيْتُونًۭا وَنَخْلًۭا

और ज़ैतून और खजूरें

30

وَحَدَآئِقَ غُلْبًۭا

और घने घने बाग़ और मेवे

31

وَفَٰكِهَةًۭ وَأَبًّۭا

और चारा (ये सब कुछ) तुम्हारे और तुम्हारे

32

مَّتَٰعًۭا لَّكُمْ وَلِأَنْعَٰمِكُمْ

चारपायों के फायदे के लिए (बनाया)

33

فَإِذَا جَآءَتِ ٱلصَّآخَّةُ

तो जब कानों के परदे फाड़ने वाली (क़यामत) आ मौजूद होगी

34

يَوْمَ يَفِرُّ ٱلْمَرْءُ مِنْ أَخِيهِ

उस दिन आदमी अपने भाई

35

وَأُمِّهِۦ وَأَبِيهِ

और अपनी माँ और अपने बाप

36

وَصَٰحِبَتِهِۦ وَبَنِيهِ

और अपने लड़के बालों से भागेगा

37

لِكُلِّ ٱمْرِئٍۢ مِّنْهُمْ يَوْمَئِذٍۢ شَأْنٌۭ يُغْنِيهِ

उस दिन हर शख़्श (अपनी नजात की) ऐसी फ़िक्र में होगा जो उसके (मशग़ूल होने के) लिए काफ़ी हों

38

وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ مُّسْفِرَةٌۭ

बहुत से चेहरे तो उस दिन चमकते होंगे

39

ضَاحِكَةٌۭ مُّسْتَبْشِرَةٌۭ

ख़न्दाँ शांदाँ (यही नेको कार हैं)

40

وَوُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍ عَلَيْهَا غَبَرَةٌۭ

और बहुत से चेहरे ऐसे होंगे जिन पर गर्द पड़ी होगी

41

تَرْهَقُهَا قَتَرَةٌ

उस पर सियाही छाई हुई होगी

42

أُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْكَفَرَةُ ٱلْفَجَرَةُ

यही कुफ्फ़ार बदकार हैं

At-Takwir
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِذَا ٱلشَّمْسُ كُوِّرَتْ

जिस वक्त आफ़ताब की चादर को लपेट लिया जाएगा

2

وَإِذَا ٱلنُّجُومُ ٱنكَدَرَتْ

और जिस वक्त तारे गिर पडेग़ें

3

وَإِذَا ٱلْجِبَالُ سُيِّرَتْ

और जब पहाड़ चलाए जाएंगें

4

وَإِذَا ٱلْعِشَارُ عُطِّلَتْ

और जब अनक़रीब जनने वाली ऊंटनियों बेकार कर दी जाएंगी

5

وَإِذَا ٱلْوُحُوشُ حُشِرَتْ

और जिस वक्त वहशी जानवर इकट्ठा किये जायेंगे

6

وَإِذَا ٱلْبِحَارُ سُجِّرَتْ

और जिस वक्त दरिया आग हो जायेंगे

7

وَإِذَا ٱلنُّفُوسُ زُوِّجَتْ

और जिस वक्त रुहें हवियों से मिला दी जाएंगी

8

وَإِذَا ٱلْمَوْءُۥدَةُ سُئِلَتْ

और जिस वक्त ज़िन्दा दर गोर लड़की से पूछा जाएगा

9

بِأَىِّ ذَنۢبٍۢ قُتِلَتْ

कि वह किस गुनाह के बदले मारी गयी

10

وَإِذَا ٱلصُّحُفُ نُشِرَتْ

और जिस वक्त (आमाल के) दफ्तर खोले जाएं

11

وَإِذَا ٱلسَّمَآءُ كُشِطَتْ

और जिस वक्त आसमान का छिलका उतारा जाएगा

12

وَإِذَا ٱلْجَحِيمُ سُعِّرَتْ

और जब दोज़ख़ (की आग) भड़कायी जाएगी

13

وَإِذَا ٱلْجَنَّةُ أُزْلِفَتْ

और जब बेहिश्त क़रीब कर दी जाएगी

14

عَلِمَتْ نَفْسٌۭ مَّآ أَحْضَرَتْ

तब हर शख़्श मालूम करेगा कि वह क्या (आमाल) लेकर आया

15

فَلَآ أُقْسِمُ بِٱلْخُنَّسِ

तो मुझे उन सितारों की क़सम जो चलते चलते पीछे हट जाते

16

ٱلْجَوَارِ ٱلْكُنَّسِ

और ग़ायब होते हैं

17

وَٱلَّيْلِ إِذَا عَسْعَسَ

और रात की क़सम जब ख़त्म होने को आए

18

وَٱلصُّبْحِ إِذَا تَنَفَّسَ

और सुबह की क़सम जब रौशन हो जाए

19

إِنَّهُۥ لَقَوْلُ رَسُولٍۢ كَرِيمٍۢ

कि बेशक यें (क़ुरान) एक मुअज़िज़ फरिश्ता (जिबरील की ज़बान का पैग़ाम है

20

ذِى قُوَّةٍ عِندَ ذِى ٱلْعَرْشِ مَكِينٍۢ

जो बड़े क़वी अर्श के मालिक की बारगाह में बुलन्द रुतबा है

21

مُّطَاعٍۢ ثَمَّ أَمِينٍۢ

वहाँ (सब फरिश्तों का) सरदार अमानतदार है

22

وَمَا صَاحِبُكُم بِمَجْنُونٍۢ

और (मक्के वालों) तुम्हारे साथी मोहम्मद दीवाने नहीं हैं

23

وَلَقَدْ رَءَاهُ بِٱلْأُفُقِ ٱلْمُبِينِ

और बेशक उन्होनें जिबरील को (आसमान के) खुले (शरक़ी) किनारे पर देखा है

24

وَمَا هُوَ عَلَى ٱلْغَيْبِ بِضَنِينٍۢ

और वह ग़ैब की बातों के ज़ाहिर करने में बख़ील नहीं

25

وَمَا هُوَ بِقَوْلِ شَيْطَٰنٍۢ رَّجِيمٍۢ

और न यह मरदूद शैतान का क़ौल है

26

فَأَيْنَ تَذْهَبُونَ

फिर तुम कहाँ जाते हो

27

إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ لِّلْعَٰلَمِينَ

ये सारे जहॉन के लोगों के लिए बस नसीहत है

28

لِمَن شَآءَ مِنكُمْ أَن يَسْتَقِيمَ

(मगर) उसी के लिए जो तुममें सीधी राह चले

29

وَمَا تَشَآءُونَ إِلَّآ أَن يَشَآءَ ٱللَّهُ رَبُّ ٱلْعَٰلَمِينَ

और तुम तो सारे जहॉन के पालने वाले ख़ुदा के चाहे बग़ैर कुछ भी चाह नहीं सकते

Al-Infitaar
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِذَا ٱلسَّمَآءُ ٱنفَطَرَتْ

जब आसमान तर्ख़ जाएगा

2

وَإِذَا ٱلْكَوَاكِبُ ٱنتَثَرَتْ

और जब तारे झड़ पड़ेंगे

3

وَإِذَا ٱلْبِحَارُ فُجِّرَتْ

और जब दरिया बह (कर एक दूसरे से मिल) जाएँगे

4

وَإِذَا ٱلْقُبُورُ بُعْثِرَتْ

और जब कब्रें उखाड़ दी जाएँगी

5

عَلِمَتْ نَفْسٌۭ مَّا قَدَّمَتْ وَأَخَّرَتْ

तब हर शख़्श को मालूम हो जाएगा कि उसने आगे क्या भेजा था और पीछे क्या छोड़ा था

6

يَٰٓأَيُّهَا ٱلْإِنسَٰنُ مَا غَرَّكَ بِرَبِّكَ ٱلْكَرِيمِ

ऐ इन्सान तुम्हें अपने परवरदिगार के बारे में किस चीज़ ने धोका दिया

7

ٱلَّذِى خَلَقَكَ فَسَوَّىٰكَ فَعَدَلَكَ

जिसने तुझे पैदा किया तो तुझे दुरूस्त बनाया और मुनासिब आज़ा दिए

8

فِىٓ أَىِّ صُورَةٍۢ مَّا شَآءَ رَكَّبَكَ

और जिस सूरत में उसने चाहा तेरे जोड़ बन्द मिलाए

9

كَلَّا بَلْ تُكَذِّبُونَ بِٱلدِّينِ

हाँ बात ये है कि तुम लोग जज़ा (के दिन) को झुठलाते हो

10

وَإِنَّ عَلَيْكُمْ لَحَٰفِظِينَ

हालॉकि तुम पर निगेहबान मुक़र्रर हैं

11

كِرَامًۭا كَٰتِبِينَ

बुर्ज़ुग लोग (फरिश्ते सब बातों को) लिखने वाले (केरामन क़ातेबीन)

12

يَعْلَمُونَ مَا تَفْعَلُونَ

जो कुछ तुम करते हो वह सब जानते हैं

13

إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ لَفِى نَعِيمٍۢ

बेशक नेको कार (बेहिश्त की) नेअमतों में होंगे

14

وَإِنَّ ٱلْفُجَّارَ لَفِى جَحِيمٍۢ

और बदकार लोग यक़ीनन जहन्नुम में जज़ा के दिन

15

يَصْلَوْنَهَا يَوْمَ ٱلدِّينِ

उसी में झोंके जाएँगे

16

وَمَا هُمْ عَنْهَا بِغَآئِبِينَ

और वह लोग उससे छुप न सकेंगे

17

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا يَوْمُ ٱلدِّينِ

और तुम्हें क्या मालूम कि जज़ा का दिन क्या है

18

ثُمَّ مَآ أَدْرَىٰكَ مَا يَوْمُ ٱلدِّينِ

फिर तुम्हें क्या मालूम कि जज़ा का दिन क्या चीज़ है

19

يَوْمَ لَا تَمْلِكُ نَفْسٌۭ لِّنَفْسٍۢ شَيْـًۭٔا ۖ وَٱلْأَمْرُ يَوْمَئِذٍۢ لِّلَّهِ

उस दिन कोई शख़्श किसी शख़्श की भलाई न कर सकेगा और उस दिन हुक्म सिर्फ ख़ुदा ही का होगा

Al-Mutaffifin
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَيْلٌۭ لِّلْمُطَفِّفِينَ

नाप तौल में कमी करने वालों की ख़राबी है

2

ٱلَّذِينَ إِذَا ٱكْتَالُوا۟ عَلَى ٱلنَّاسِ يَسْتَوْفُونَ

जो औरें से नाप कर लें तो पूरा पूरा लें

3

وَإِذَا كَالُوهُمْ أَو وَّزَنُوهُمْ يُخْسِرُونَ

और जब उनकी नाप या तौल कर दें तो कम कर दें

4

أَلَا يَظُنُّ أُو۟لَٰٓئِكَ أَنَّهُم مَّبْعُوثُونَ

क्या ये लोग इतना भी ख्याल नहीं करते

5

لِيَوْمٍ عَظِيمٍۢ

कि एक बड़े (सख्त) दिन (क़यामत) में उठाए जाएँगे

6

يَوْمَ يَقُومُ ٱلنَّاسُ لِرَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ

जिस दिन तमाम लोग सारे जहाँन के परवरदिगार के सामने खड़े होंगे

7

كَلَّآ إِنَّ كِتَٰبَ ٱلْفُجَّارِ لَفِى سِجِّينٍۢ

सुन रखो कि बदकारों के नाम ए अमाल सिज्जीन में हैं

8

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا سِجِّينٌۭ

तुमको क्या मालूम सिज्जीन क्या चीज़ है

9

كِتَٰبٌۭ مَّرْقُومٌۭ

एक लिखा हुआ दफ़तर है जिसमें शयातीन के (आमाल दर्ज हैं)

10

وَيْلٌۭ يَوْمَئِذٍۢ لِّلْمُكَذِّبِينَ

उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है

11

ٱلَّذِينَ يُكَذِّبُونَ بِيَوْمِ ٱلدِّينِ

जो लोग रोजे ज़ज़ा को झुठलाते हैं

12

وَمَا يُكَذِّبُ بِهِۦٓ إِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ

हालॉकि उसको हद से निकल जाने वाले गुनाहगार के सिवा कोई नहीं झुठलाता

13

إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ءَايَٰتُنَا قَالَ أَسَٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ

जब उसके सामने हमारी आयतें पढ़ी जाती हैं तो कहता है कि ये तो अगलों के अफसाने हैं

14

كَلَّا ۖ بَلْ ۜ رَانَ عَلَىٰ قُلُوبِهِم مَّا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ

नहीं नहीं बात ये है कि ये लोग जो आमाल (बद) करते हैं उनका उनके दिलों पर जंग बैठ गया है

15

كَلَّآ إِنَّهُمْ عَن رَّبِّهِمْ يَوْمَئِذٍۢ لَّمَحْجُوبُونَ

बेशक ये लोग उस दिन अपने परवरदिगार (की रहमत से) रोक दिए जाएँगे

16

ثُمَّ إِنَّهُمْ لَصَالُوا۟ ٱلْجَحِيمِ

फिर ये लोग ज़रूर जहन्नुम वासिल होंगे

17

ثُمَّ يُقَالُ هَٰذَا ٱلَّذِى كُنتُم بِهِۦ تُكَذِّبُونَ

फिर उनसे कहा जाएगा कि ये वही चीज़ तो है जिसे तुम झुठलाया करते थे

18

كَلَّآ إِنَّ كِتَٰبَ ٱلْأَبْرَارِ لَفِى عِلِّيِّينَ

ये भी सुन रखो कि नेको के नाम ए अमाल इल्लीयीन में होंगे

19

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا عِلِّيُّونَ

और तुमको क्या मालूम कि इल्लीयीन क्या है वह एक लिखा हुआ दफ़तर है

20

كِتَٰبٌۭ مَّرْقُومٌۭ

जिसमें नेकों के आमाल दर्ज हैं

21

يَشْهَدُهُ ٱلْمُقَرَّبُونَ

उसके पास मुक़र्रिब (फ़रिश्ते) हाज़िर हैं

22

إِنَّ ٱلْأَبْرَارَ لَفِى نَعِيمٍ

बेशक नेक लोग नेअमतों में होंगे

23

عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ

तख्तों पर बैठे नज़ारे करेंगे

24

تَعْرِفُ فِى وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ ٱلنَّعِيمِ

तुम उनके चेहरों ही से राहत की ताज़गी मालूम कर लोगे

25

يُسْقَوْنَ مِن رَّحِيقٍۢ مَّخْتُومٍ

उनको सर ब मोहर ख़ालिस शराब पिलायी जाएगी

26

خِتَٰمُهُۥ مِسْكٌۭ ۚ وَفِى ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ ٱلْمُتَنَٰفِسُونَ

जिसकी मोहर मिश्क की होगी और उसकी तरफ अलबत्ता शायक़ीन को रग़बत करनी चाहिए

27

وَمِزَاجُهُۥ مِن تَسْنِيمٍ

और उस (शराब) में तसनीम के पानी की आमेज़िश होगी

28

عَيْنًۭا يَشْرَبُ بِهَا ٱلْمُقَرَّبُونَ

वह एक चश्मा है जिसमें मुक़रेबीन पियेंगे

29

إِنَّ ٱلَّذِينَ أَجْرَمُوا۟ كَانُوا۟ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يَضْحَكُونَ

बेशक जो गुनाहगार मोमिनों से हँसी किया करते थे

30

وَإِذَا مَرُّوا۟ بِهِمْ يَتَغَامَزُونَ

और जब उनके पास से गुज़रते तो उन पर चशमक करते थे

31

وَإِذَا ٱنقَلَبُوٓا۟ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمُ ٱنقَلَبُوا۟ فَكِهِينَ

और जब अपने लड़के वालों की तरफ़ लौट कर आते थे तो इतराते हुए

32

وَإِذَا رَأَوْهُمْ قَالُوٓا۟ إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ لَضَآلُّونَ

और जब उन मोमिनीन को देखते तो कह बैठते थे कि ये तो यक़ीनी गुमराह हैं

33

وَمَآ أُرْسِلُوا۟ عَلَيْهِمْ حَٰفِظِينَ

हालॉकि ये लोग उन पर कुछ निगराँ बना के तो भेजे नहीं गए थे

34

فَٱلْيَوْمَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ مِنَ ٱلْكُفَّارِ يَضْحَكُونَ

तो आज (क़यामत में) ईमानदार लोग काफ़िरों से हँसी करेंगे

35

عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ يَنظُرُونَ

(और) तख्तों पर बैठे नज़ारे करेंगे

36

هَلْ ثُوِّبَ ٱلْكُفَّارُ مَا كَانُوا۟ يَفْعَلُونَ

कि अब तो काफ़िरों को उनके किए का पूरा पूरा बदला मिल गया

Al-Inshiqaaq
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِذَا ٱلسَّمَآءُ ٱنشَقَّتْ

जब आसमान फट जाएगा

2

وَأَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْ

और अपने परवरदिगार का हुक्म बजा लाएगा और उसे वाजिब भी यही है

3

وَإِذَا ٱلْأَرْضُ مُدَّتْ

और जब ज़मीन (बराबर करके) तान दी जाएगी

4

وَأَلْقَتْ مَا فِيهَا وَتَخَلَّتْ

और जो कुछ उसमें है उगल देगी और बिल्कुल ख़ाली हो जाएगी

5

وَأَذِنَتْ لِرَبِّهَا وَحُقَّتْ

और अपने परवरदिगार का हुक्म बजा लाएगी

6

يَٰٓأَيُّهَا ٱلْإِنسَٰنُ إِنَّكَ كَادِحٌ إِلَىٰ رَبِّكَ كَدْحًۭا فَمُلَٰقِيهِ

और उस पर लाज़िम भी यही है (तो क़यामत आ जाएगी) ऐ इन्सान तू अपने परवरदिगार की हुज़ूरी की कोशिश करता है

7

فَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَٰبَهُۥ بِيَمِينِهِۦ

तो तू (एक न एक दिन) उसके सामने हाज़िर होगा फिर (उस दिन) जिसका नामाए आमाल उसके दाहिने हाथ में दिया जाएगा

8

فَسَوْفَ يُحَاسَبُ حِسَابًۭا يَسِيرًۭا

उससे तो हिसाब आसान तरीके से लिया जाएगा

9

وَيَنقَلِبُ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ مَسْرُورًۭا

और (फिर) वह अपने (मोमिनीन के) क़बीले की तरफ ख़ुश ख़ुश पलटेगा

10

وَأَمَّا مَنْ أُوتِىَ كِتَٰبَهُۥ وَرَآءَ ظَهْرِهِۦ

लेकिन जिस शख़्श को उसका नामए आमल उसकी पीठ के पीछे से दिया जाएगा

11

فَسَوْفَ يَدْعُوا۟ ثُبُورًۭا

वह तो मौत की दुआ करेगा

12

وَيَصْلَىٰ سَعِيرًا

और जहन्नुम वासिल होगा

13

إِنَّهُۥ كَانَ فِىٓ أَهْلِهِۦ مَسْرُورًا

ये शख़्श तो अपने लड़के बालों में मस्त रहता था

14

إِنَّهُۥ ظَنَّ أَن لَّن يَحُورَ

और समझता था कि कभी (ख़ुदा की तरफ) फिर कर जाएगा ही नहीं

15

بَلَىٰٓ إِنَّ رَبَّهُۥ كَانَ بِهِۦ بَصِيرًۭا

हाँ उसका परवरदिगार यक़ीनी उसको देख भाल कर रहा है

16

فَلَآ أُقْسِمُ بِٱلشَّفَقِ

तो मुझे शाम की मुर्ख़ी की क़सम

17

وَٱلَّيْلِ وَمَا وَسَقَ

और रात की और उन चीज़ों की जिन्हें ये ढाँक लेती है

18

وَٱلْقَمَرِ إِذَا ٱتَّسَقَ

और चाँद की जब पूरा हो जाए

19

لَتَرْكَبُنَّ طَبَقًا عَن طَبَقٍۢ

कि तुम लोग ज़रूर एक सख्ती के बाद दूसरी सख्ती में फँसोगे

20

فَمَا لَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ

तो उन लोगों को क्या हो गया है कि ईमान नहीं ईमान नहीं लाते

21

وَإِذَا قُرِئَ عَلَيْهِمُ ٱلْقُرْءَانُ لَا يَسْجُدُونَ ۩

और जब उनके सामने क़ुरान पढ़ा जाता है तो (ख़ुदा का) सजदा नहीं करते (21) (सजदा)

22

بَلِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ يُكَذِّبُونَ

बल्कि काफ़िर लोग तो (और उसे) झुठलाते हैं

23

وَٱللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُوعُونَ

और जो बातें ये लोग अपने दिलों में छिपाते हैं ख़ुदा उसे ख़ूब जानता है

24

فَبَشِّرْهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٍ

तो (ऐ रसूल) उन्हें दर्दनाक अज़ाब की ख़ुशख़बरी दे दो

25

إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍۭ

मगर जो लोग ईमान लाए और उन्होंने अच्छे अच्छे काम किए उनके लिए बेइन्तिहा अज्र (व सवाब है)

Al-Burooj
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلْبُرُوجِ

बुर्ज़ों वाले आसमानों की क़सम

2

وَٱلْيَوْمِ ٱلْمَوْعُودِ

और उस दिन की जिसका वायदा किया गया है

3

وَشَاهِدٍۢ وَمَشْهُودٍۢ

और गवाह की और जिसकी गवाही दे जाएगी

4

قُتِلَ أَصْحَٰبُ ٱلْأُخْدُودِ

उसकी (कि कुफ्फ़ार मक्का हलाक हुए) जिस तरह ख़न्दक़ वाले हलाक कर दिए गए

5

ٱلنَّارِ ذَاتِ ٱلْوَقُودِ

जो ख़न्दक़ें आग की थीं

6

إِذْ هُمْ عَلَيْهَا قُعُودٌۭ

जिसमें (उन्होंने मुसलमानों के लिए) ईंधन झोंक रखा था

7

وَهُمْ عَلَىٰ مَا يَفْعَلُونَ بِٱلْمُؤْمِنِينَ شُهُودٌۭ

जब वह उन (ख़न्दक़ों) पर बैठे हुए और जो सुलूक ईमानदारों के साथ करते थे उसको सामने देख रहे थे

8

وَمَا نَقَمُوا۟ مِنْهُمْ إِلَّآ أَن يُؤْمِنُوا۟ بِٱللَّهِ ٱلْعَزِيزِ ٱلْحَمِيدِ

और उनको मोमिनीन की यही बात बुरी मालूम हुई कि वह लोग ख़ुदा पर ईमान लाए थे जो ज़बरदस्त और सज़ावार हम्द है

9

ٱلَّذِى لَهُۥ مُلْكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ ۚ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍۢ شَهِيدٌ

वह (ख़ुदा) जिसकी सारे आसमान ज़मीन में बादशाहत है और ख़ुदा हर चीज़ से वाक़िफ़ है

10

إِنَّ ٱلَّذِينَ فَتَنُوا۟ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَٱلْمُؤْمِنَٰتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا۟ فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ ٱلْحَرِيقِ

बेशक जिन लोगों ने ईमानदार मर्दों और औरतों को तकलीफें दीं फिर तौबा न की उनके लिए जहन्नुम का अज़ाब तो है ही (इसके अलावा) जलने का भी अज़ाब होगा

11

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَهُمْ جَنَّٰتٌۭ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَٰرُ ۚ ذَٰلِكَ ٱلْفَوْزُ ٱلْكَبِيرُ

बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे उनके लिए वह बाग़ात हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं यही तो बड़ी कामयाबी है

12

إِنَّ بَطْشَ رَبِّكَ لَشَدِيدٌ

बेशक तुम्हारे परवरदिगार की पकड़ बहुत सख्त है

13

إِنَّهُۥ هُوَ يُبْدِئُ وَيُعِيدُ

वही पहली दफ़ा पैदा करता है और वही दोबारा (क़यामत में ज़िन्दा) करेगा

14

وَهُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلْوَدُودُ

और वही बड़ा बख्शने वाला मोहब्बत करने वाला है

15

ذُو ٱلْعَرْشِ ٱلْمَجِيدُ

अर्श का मालिक बड़ा आलीशान है

16

فَعَّالٌۭ لِّمَا يُرِيدُ

जो चाहता है करता है

17

هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ٱلْجُنُودِ

क्या तुम्हारे पास लशकरों की ख़बर पहुँची है

18

فِرْعَوْنَ وَثَمُودَ

(यानि) फिरऔन व समूद की (ज़रूर पहुँची है)

19

بَلِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ فِى تَكْذِيبٍۢ

मगर कुफ्फ़ार तो झुठलाने ही (की फ़िक्र) में हैं

20

وَٱللَّهُ مِن وَرَآئِهِم مُّحِيطٌۢ

और ख़ुदा उनको पीछे से घेरे हुए है (ये झुठलाने के क़ाबिल नहीं)

21

بَلْ هُوَ قُرْءَانٌۭ مَّجِيدٌۭ

बल्कि ये तो क़ुरान मजीद है

22

فِى لَوْحٍۢ مَّحْفُوظٍۭ

जो लौहे महफूज़ में लिखा हुआ है

At-Taariq
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلسَّمَآءِ وَٱلطَّارِقِ

आसमान और रात को आने वाले की क़सम

2

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلطَّارِقُ

और तुमको क्या मालूम रात को आने वाला क्या है

3

ٱلنَّجْمُ ٱلثَّاقِبُ

(वह) चमकता हुआ तारा है

4

إِن كُلُّ نَفْسٍۢ لَّمَّا عَلَيْهَا حَافِظٌۭ

(इस बात की क़सम) कि कोई शख़्श ऐसा नहीं जिस पर निगेहबान मुक़र्रर नहीं

5

فَلْيَنظُرِ ٱلْإِنسَٰنُ مِمَّ خُلِقَ

तो इन्सान को देखना चाहिए कि वह किस चीज़ से पैदा हुआ हैं

6

خُلِقَ مِن مَّآءٍۢ دَافِقٍۢ

वह उछलते हुए पानी (मनी) से पैदा हुआ है

7

يَخْرُجُ مِنۢ بَيْنِ ٱلصُّلْبِ وَٱلتَّرَآئِبِ

जो पीठ और सीने की हड्डियों के बीच में से निकलता है

8

إِنَّهُۥ عَلَىٰ رَجْعِهِۦ لَقَادِرٌۭ

बेशक ख़ुदा उसके दोबारा (पैदा) करने पर ज़रूर कुदरत रखता है

9

يَوْمَ تُبْلَى ٱلسَّرَآئِرُ

जिस दिन दिलों के भेद जाँचे जाएँगे

10

فَمَا لَهُۥ مِن قُوَّةٍۢ وَلَا نَاصِرٍۢ

तो (उस दिन) उसका न कुछ ज़ोर चलेगा और न कोई मददगार होगा

11

وَٱلسَّمَآءِ ذَاتِ ٱلرَّجْعِ

चक्कर (खाने) वाले आसमान की क़सम

12

وَٱلْأَرْضِ ذَاتِ ٱلصَّدْعِ

और फटने वाली (ज़मीन की क़सम)

13

إِنَّهُۥ لَقَوْلٌۭ فَصْلٌۭ

बेशक ये क़ुरान क़ौले फ़ैसल है

14

وَمَا هُوَ بِٱلْهَزْلِ

और लग़ो नहीं है

15

إِنَّهُمْ يَكِيدُونَ كَيْدًۭا

बेशक ये कुफ्फ़ार अपनी तदबीर कर रहे हैं

16

وَأَكِيدُ كَيْدًۭا

और मैं अपनी तद्बीर कर रहा हूँ

17

فَمَهِّلِ ٱلْكَٰفِرِينَ أَمْهِلْهُمْ رُوَيْدًۢا

तो काफ़िरों को मोहलत दो बस उनको थोड़ी सी मोहलत दो

Al-A'laa
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ سَبِّحِ ٱسْمَ رَبِّكَ ٱلْأَعْلَى

ऐ रसूल अपने आलीशान परवरदिगार के नाम की तस्बीह करो

2

ٱلَّذِى خَلَقَ فَسَوَّىٰ

जिसने (हर चीज़ को) पैदा किया

3

وَٱلَّذِى قَدَّرَ فَهَدَىٰ

और दुरूस्त किया और जिसने (उसका) अन्दाज़ा मुक़र्रर किया फिर राह बतायी

4

وَٱلَّذِىٓ أَخْرَجَ ٱلْمَرْعَىٰ

और जिसने (हैवानात के लिए) चारा उगाया

5

فَجَعَلَهُۥ غُثَآءً أَحْوَىٰ

फिर ख़ुश्क उसे सियाह रंग का कूड़ा कर दिया

6

سَنُقْرِئُكَ فَلَا تَنسَىٰٓ

हम तुम्हें (ऐसा) पढ़ा देंगे कि कभी भूलो ही नहीं

7

إِلَّا مَا شَآءَ ٱللَّهُ ۚ إِنَّهُۥ يَعْلَمُ ٱلْجَهْرَ وَمَا يَخْفَىٰ

मगर जो ख़ुदा चाहे (मन्सूख़ कर दे) बेशक वह खुली बात को भी जानता है और छुपे हुए को भी

8

وَنُيَسِّرُكَ لِلْيُسْرَىٰ

और हम तुमको आसान तरीके की तौफ़ीक़ देंगे

9

فَذَكِّرْ إِن نَّفَعَتِ ٱلذِّكْرَىٰ

तो जहाँ तक समझाना मुफ़ीद हो समझते रहो

10

سَيَذَّكَّرُ مَن يَخْشَىٰ

जो खौफ रखता हो वह तो फौरी समझ जाएगा

11

وَيَتَجَنَّبُهَا ٱلْأَشْقَى

और बदबख्त उससे पहलू तही करेगा

12

ٱلَّذِى يَصْلَى ٱلنَّارَ ٱلْكُبْرَىٰ

जो (क़यामत में) बड़ी (तेज़) आग में दाख़िल होगा

13

ثُمَّ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَىٰ

फिर न वहाँ मरेगा ही न जीयेगा

14

قَدْ أَفْلَحَ مَن تَزَكَّىٰ

वह यक़ीनन मुराद दिली को पहुँचा जो (शिर्क से) पाक हो

15

وَذَكَرَ ٱسْمَ رَبِّهِۦ فَصَلَّىٰ

और अपने परवरदिगार का ज़िक्र करता और नमाज़ पढ़ता रहा

16

بَلْ تُؤْثِرُونَ ٱلْحَيَوٰةَ ٱلدُّنْيَا

मगर तुम लोग दुनियावी ज़िन्दगी को तरजीह देते हो

17

وَٱلْءَاخِرَةُ خَيْرٌۭ وَأَبْقَىٰٓ

हालॉकि आख़ोरत कहीं बेहतर और देर पा है

18

إِنَّ هَٰذَا لَفِى ٱلصُّحُفِ ٱلْأُولَىٰ

बेशक यही बात अगले सहीफ़ों

19

صُحُفِ إِبْرَٰهِيمَ وَمُوسَىٰ

इबराहीम और मूसा के सहीफ़ों में भी है

Al-Ghaashiya
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ هَلْ أَتَىٰكَ حَدِيثُ ٱلْغَٰشِيَةِ

भला तुमको ढाँप लेने वाली मुसीबत (क़यामत) का हाल मालुम हुआ है

2

وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍ خَٰشِعَةٌ

उस दिन बहुत से चेहरे ज़लील रूसवा होंगे

3

عَامِلَةٌۭ نَّاصِبَةٌۭ

(तौक़ व जंज़ीर से) मयक्क़त करने वाले

4

تَصْلَىٰ نَارًا حَامِيَةًۭ

थके माँदे दहकती हुई आग में दाखिल होंगे

5

تُسْقَىٰ مِنْ عَيْنٍ ءَانِيَةٍۢ

उन्हें एक खौलते हुए चशमें का पानी पिलाया जाएगा

6

لَّيْسَ لَهُمْ طَعَامٌ إِلَّا مِن ضَرِيعٍۢ

ख़ारदार झाड़ी के सिवा उनके लिए कोई खाना नहीं

7

لَّا يُسْمِنُ وَلَا يُغْنِى مِن جُوعٍۢ

जो मोटाई पैदा करे न भूख में कुछ काम आएगा

8

وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ نَّاعِمَةٌۭ

(और) बहुत से चेहरे उस दिन तरो ताज़ा होंगे

9

لِّسَعْيِهَا رَاضِيَةٌۭ

अपनी कोशिश (के नतीजे) पर शादमान

10

فِى جَنَّةٍ عَالِيَةٍۢ

एक आलीशान बाग़ में

11

لَّا تَسْمَعُ فِيهَا لَٰغِيَةًۭ

वहाँ कोई लग़ो बात सुनेंगे ही नहीं

12

فِيهَا عَيْنٌۭ جَارِيَةٌۭ

उसमें चश्में जारी होंगें

13

فِيهَا سُرُرٌۭ مَّرْفُوعَةٌۭ

उसमें ऊँचे ऊँचे तख्त बिछे होंगे

14

وَأَكْوَابٌۭ مَّوْضُوعَةٌۭ

और (उनके किनारे) गिलास रखे होंगे

15

وَنَمَارِقُ مَصْفُوفَةٌۭ

और गाँव तकिए क़तार की क़तार लगे होंगे

16

وَزَرَابِىُّ مَبْثُوثَةٌ

और नफ़ीस मसनदे बिछी हुई

17

أَفَلَا يَنظُرُونَ إِلَى ٱلْإِبِلِ كَيْفَ خُلِقَتْ

तो क्या ये लोग ऊँट की तरह ग़ौर नहीं करते कि कैसा अजीब पैदा किया गया है

18

وَإِلَى ٱلسَّمَآءِ كَيْفَ رُفِعَتْ

और आसमान की तरफ कि क्या बुलन्द बनाया गया है

19

وَإِلَى ٱلْجِبَالِ كَيْفَ نُصِبَتْ

और पहाड़ों की तरफ़ कि किस तरह खड़े किए गए हैं

20

وَإِلَى ٱلْأَرْضِ كَيْفَ سُطِحَتْ

और ज़मीन की तरफ कि किस तरह बिछायी गयी है

21

فَذَكِّرْ إِنَّمَآ أَنتَ مُذَكِّرٌۭ

तो तुम नसीहत करते रहो तुम तो बस नसीहत करने वाले हो

22

لَّسْتَ عَلَيْهِم بِمُصَيْطِرٍ

तुम कुछ उन पर दरोग़ा तो हो नहीं

23

إِلَّا مَن تَوَلَّىٰ وَكَفَرَ

हाँ जिसने मुँह फेर लिया

24

فَيُعَذِّبُهُ ٱللَّهُ ٱلْعَذَابَ ٱلْأَكْبَرَ

और न माना तो ख़ुदा उसको बहुत बड़े अज़ाब की सज़ा देगा

25

إِنَّ إِلَيْنَآ إِيَابَهُمْ

बेशक उनको हमारी तरफ़ लौट कर आना है

26

ثُمَّ إِنَّ عَلَيْنَا حِسَابَهُم

फिर उनका हिसाब हमारे ज़िम्मे है

Al-Fajr
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلْفَجْرِ

सुबह की क़सम

2

وَلَيَالٍ عَشْرٍۢ

और दस रातों की

3

وَٱلشَّفْعِ وَٱلْوَتْرِ

और ज़ुफ्त व ताक़ की

4

وَٱلَّيْلِ إِذَا يَسْرِ

और रात की जब आने लगे

5

هَلْ فِى ذَٰلِكَ قَسَمٌۭ لِّذِى حِجْرٍ

अक्लमन्द के वास्ते तो ज़रूर बड़ी क़सम है (कि कुफ्फ़ार पर ज़रूर अज़ाब होगा)

6

أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِعَادٍ

क्या तुमने देखा नहीं कि तुम्हारे आद के साथ क्या किया

7

إِرَمَ ذَاتِ ٱلْعِمَادِ

यानि इरम वाले दराज़ क़द

8

ٱلَّتِى لَمْ يُخْلَقْ مِثْلُهَا فِى ٱلْبِلَٰدِ

जिनका मिसल तमाम (दुनिया के) शहरों में कोई पैदा ही नहीं किया गया

9

وَثَمُودَ ٱلَّذِينَ جَابُوا۟ ٱلصَّخْرَ بِٱلْوَادِ

और समूद के साथ (क्या किया) जो वादी (क़रा) में पत्थर तराश कर घर बनाते थे

10

وَفِرْعَوْنَ ذِى ٱلْأَوْتَادِ

और फिरऔन के साथ (क्या किया) जो (सज़ा के लिए) मेख़े रखता था

11

ٱلَّذِينَ طَغَوْا۟ فِى ٱلْبِلَٰدِ

ये लोग मुख़तलिफ़ शहरों में सरकश हो रहे थे

12

فَأَكْثَرُوا۟ فِيهَا ٱلْفَسَادَ

और उनमें बहुत से फ़साद फैला रखे थे

13

فَصَبَّ عَلَيْهِمْ رَبُّكَ سَوْطَ عَذَابٍ

तो तुम्हारे परवरदिगार ने उन पर अज़ाब का कोड़ा लगाया

14

إِنَّ رَبَّكَ لَبِٱلْمِرْصَادِ

बेशक तुम्हारा परवरदिगार ताक में है

15

فَأَمَّا ٱلْإِنسَٰنُ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ رَبُّهُۥ فَأَكْرَمَهُۥ وَنَعَّمَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَكْرَمَنِ

लेकिन इन्सान जब उसको उसका परवरदिगार (इस तरह) आज़माता है कि उसको इज्ज़त व नेअमत देता है, तो कहता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे इज्ज़त दी है

16

وَأَمَّآ إِذَا مَا ٱبْتَلَىٰهُ فَقَدَرَ عَلَيْهِ رِزْقَهُۥ فَيَقُولُ رَبِّىٓ أَهَٰنَنِ

मगर जब उसको (इस तरह) आज़माता है कि उस पर रोज़ी को तंग कर देता है बोल उठता है कि मेरे परवरदिगार ने मुझे ज़लील किया

17

كَلَّا ۖ بَل لَّا تُكْرِمُونَ ٱلْيَتِيمَ

हरगिज़ नहीं बल्कि तुम लोग न यतीम की ख़ातिरदारी करते हो

18

وَلَا تَحَٰٓضُّونَ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ

और न मोहताज को खाना खिलाने की तरग़ीब देते हो

19

وَتَأْكُلُونَ ٱلتُّرَاثَ أَكْلًۭا لَّمًّۭا

और मीरारा के माल (हलाल व हराम) को समेट कर चख जाते हो

20

وَتُحِبُّونَ ٱلْمَالَ حُبًّۭا جَمًّۭا

और माल को बहुत ही अज़ीज़ रखते हो

21

كَلَّآ إِذَا دُكَّتِ ٱلْأَرْضُ دَكًّۭا دَكًّۭا

सुन रखो कि जब ज़मीन कूट कूट कर रेज़ा रेज़ा कर दी जाएगी

22

وَجَآءَ رَبُّكَ وَٱلْمَلَكُ صَفًّۭا صَفًّۭا

और तुम्हारे परवरदिगार का हुक्म और फ़रिश्ते कतार के कतार आ जाएँगे

23

وَجِا۟ىٓءَ يَوْمَئِذٍۭ بِجَهَنَّمَ ۚ يَوْمَئِذٍۢ يَتَذَكَّرُ ٱلْإِنسَٰنُ وَأَنَّىٰ لَهُ ٱلذِّكْرَىٰ

और उस दिन जहन्नुम सामने कर दी जाएगी उस दिन इन्सान चौंकेगा मगर अब चौंकना कहाँ (फ़ायदा देगा)

24

يَقُولُ يَٰلَيْتَنِى قَدَّمْتُ لِحَيَاتِى

(उस वक्त) क़हेगा कि काश मैने अपनी (इस) ज़िन्दगी के वास्ते कुछ पहले भेजा होता

25

فَيَوْمَئِذٍۢ لَّا يُعَذِّبُ عَذَابَهُۥٓ أَحَدٌۭ

तो उस दिन ख़ुदा ऐसा अज़ाब करेगा कि किसी ने वैसा अज़ाब न किया होगा

26

وَلَا يُوثِقُ وَثَاقَهُۥٓ أَحَدٌۭ

और न कोई उसके जकड़ने की तरह जकड़ेगा

27

يَٰٓأَيَّتُهَا ٱلنَّفْسُ ٱلْمُطْمَئِنَّةُ

(और कुछ लोगों से कहेगा) ऐ इत्मेनान पाने वाली जान

28

ٱرْجِعِىٓ إِلَىٰ رَبِّكِ رَاضِيَةًۭ مَّرْضِيَّةًۭ

अपने परवरदिगार की तरफ़ चल तू उससे ख़ुश वह तुझ से राज़ी

29

فَٱدْخُلِى فِى عِبَٰدِى

तो मेरे (ख़ास) बन्दों में शामिल हो जा

30

وَٱدْخُلِى جَنَّتِى

और मेरे बेहिश्त में दाख़िल हो जा

Al-Balad
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ لَآ أُقْسِمُ بِهَٰذَا ٱلْبَلَدِ

मुझे इस शहर (मक्का) की कसम

2

وَأَنتَ حِلٌّۢ بِهَٰذَا ٱلْبَلَدِ

और तुम इसी शहर में तो रहते हो

3

وَوَالِدٍۢ وَمَا وَلَدَ

और (तुम्हारे) बाप (आदम) और उसकी औलाद की क़सम

4

لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَٰنَ فِى كَبَدٍ

हमने इन्सान को मशक्क़त में (रहने वाला) पैदा किया है

5

أَيَحْسَبُ أَن لَّن يَقْدِرَ عَلَيْهِ أَحَدٌۭ

क्या वह ये समझता है कि उस पर कोई काबू न पा सकेगा

6

يَقُولُ أَهْلَكْتُ مَالًۭا لُّبَدًا

वह कहता है कि मैने अलग़ारों माल उड़ा दिया

7

أَيَحْسَبُ أَن لَّمْ يَرَهُۥٓ أَحَدٌ

क्या वह ये ख्याल रखता है कि उसको किसी ने देखा ही नहीं

8

أَلَمْ نَجْعَل لَّهُۥ عَيْنَيْنِ

क्या हमने उसे दोनों ऑंखें और ज़बान

9

وَلِسَانًۭا وَشَفَتَيْنِ

और दोनों लब नहीं दिए (ज़रूर दिए)

10

وَهَدَيْنَٰهُ ٱلنَّجْدَيْنِ

और उसको (अच्छी बुरी) दोनों राहें भी दिखा दीं

11

فَلَا ٱقْتَحَمَ ٱلْعَقَبَةَ

फिर वह घाटी पर से होकर (क्यों) नहीं गुज़रा

12

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْعَقَبَةُ

और तुमको क्या मालूम कि घाटी क्या है

13

فَكُّ رَقَبَةٍ

किसी (की) गर्दन का (गुलामी या कर्ज से) छुड़ाना

14

أَوْ إِطْعَٰمٌۭ فِى يَوْمٍۢ ذِى مَسْغَبَةٍۢ

या भूख के दिन रिश्तेदार यतीम या ख़ाकसार

15

يَتِيمًۭا ذَا مَقْرَبَةٍ

मोहताज को

16

أَوْ مِسْكِينًۭا ذَا مَتْرَبَةٍۢ

खाना खिलाना

17

ثُمَّ كَانَ مِنَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْمَرْحَمَةِ

फिर तो उन लोगों में (शामिल) हो जाता जो ईमान लाए और सब्र की नसीहत और तरस खाने की वसीयत करते रहे

18

أُو۟لَٰٓئِكَ أَصْحَٰبُ ٱلْمَيْمَنَةِ

यही लोग ख़ुश नसीब हैं

19

وَٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ بِـَٔايَٰتِنَا هُمْ أَصْحَٰبُ ٱلْمَشْـَٔمَةِ

और जिन लोगों ने हमारी आयतों से इन्कार किया है यही लोग बदबख्त हैं

20

عَلَيْهِمْ نَارٌۭ مُّؤْصَدَةٌۢ

कि उनको आग में डाल कर हर तरफ से बन्द कर दिया जाएगा

Ash-Shams
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلشَّمْسِ وَضُحَىٰهَا

सूरज की क़सम और उसकी रौशनी की

2

وَٱلْقَمَرِ إِذَا تَلَىٰهَا

और चाँद की जब उसके पीछे निकले

3

وَٱلنَّهَارِ إِذَا جَلَّىٰهَا

और दिन की जब उसे चमका दे

4

وَٱلَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰهَا

और रात की जब उसे ढाँक ले

5

وَٱلسَّمَآءِ وَمَا بَنَىٰهَا

और आसमान की और जिसने उसे बनाया

6

وَٱلْأَرْضِ وَمَا طَحَىٰهَا

और ज़मीन की जिसने उसे बिछाया

7

وَنَفْسٍۢ وَمَا سَوَّىٰهَا

और जान की और जिसने उसे दुरूस्त किया

8

فَأَلْهَمَهَا فُجُورَهَا وَتَقْوَىٰهَا

फिर उसकी बदकारी और परहेज़गारी को उसे समझा दिया

9

قَدْ أَفْلَحَ مَن زَكَّىٰهَا

(क़सम है) जिसने उस (जान) को (गनाह से) पाक रखा वह तो कामयाब हुआ

10

وَقَدْ خَابَ مَن دَسَّىٰهَا

और जिसने उसे (गुनाह करके) दबा दिया वह नामुराद रहा

11

كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِطَغْوَىٰهَآ

क़ौम मसूद ने अपनी सरकशी से (सालेह पैग़म्बर को) झुठलाया,

12

إِذِ ٱنۢبَعَثَ أَشْقَىٰهَا

जब उनमें का एक बड़ा बदबख्त उठ खड़ा हुआ

13

فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ ٱللَّهِ نَاقَةَ ٱللَّهِ وَسُقْيَٰهَا

तो ख़ुदा के रसूल (सालेह) ने उनसे कहा कि ख़ुदा की ऊँटनी और उसके पानी पीने से तअर्रुज़ न करना

14

فَكَذَّبُوهُ فَعَقَرُوهَا فَدَمْدَمَ عَلَيْهِمْ رَبُّهُم بِذَنۢبِهِمْ فَسَوَّىٰهَا

मगर उन लोगों पैग़म्बर को झुठलाया और उसकी कूँचे काट डाली तो ख़ुदा ने उनके गुनाहों सबब से उन पर अज़ाब नाज़िल किया फिर (हलाक करके) बराबर कर दिया

15

وَلَا يَخَافُ عُقْبَٰهَا

और उसको उनके बदले का कोई ख़ौफ तो है नहीं

Al-Lail
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلَّيْلِ إِذَا يَغْشَىٰ

रात की क़सम जब (सूरज को) छिपा ले

2

وَٱلنَّهَارِ إِذَا تَجَلَّىٰ

और दिन की क़सम जब ख़ूब रौशन हो

3

وَمَا خَلَقَ ٱلذَّكَرَ وَٱلْأُنثَىٰٓ

और उस (ज़ात) की जिसने नर व मादा को पैदा किया

4

إِنَّ سَعْيَكُمْ لَشَتَّىٰ

कि बेशक तुम्हारी कोशिश तरह तरह की है

5

فَأَمَّا مَنْ أَعْطَىٰ وَٱتَّقَىٰ

तो जिसने सख़ावत की और अच्छी बात (इस्लाम) की तस्दीक़ की

6

وَصَدَّقَ بِٱلْحُسْنَىٰ

तो हम उसके लिए राहत व आसानी

7

فَسَنُيَسِّرُهُۥ لِلْيُسْرَىٰ

(जन्नत) के असबाब मुहय्या कर देंगे

8

وَأَمَّا مَنۢ بَخِلَ وَٱسْتَغْنَىٰ

और जिसने बुख्ल किया, और बेपरवाई की

9

وَكَذَّبَ بِٱلْحُسْنَىٰ

और अच्छी बात को झुठलाया

10

فَسَنُيَسِّرُهُۥ لِلْعُسْرَىٰ

तो हम उसे सख्ती (जहन्नुम) में पहुँचा देंगे,

11

وَمَا يُغْنِى عَنْهُ مَالُهُۥٓ إِذَا تَرَدَّىٰٓ

और जब वह हलाक होगा तो उसका माल उसके कुछ भी काम न आएगा

12

إِنَّ عَلَيْنَا لَلْهُدَىٰ

हमें राह दिखा देना ज़रूर है

13

وَإِنَّ لَنَا لَلْءَاخِرَةَ وَٱلْأُولَىٰ

और आख़ेरत और दुनिया (दोनों) ख़ास हमारी चीज़े हैं

14

فَأَنذَرْتُكُمْ نَارًۭا تَلَظَّىٰ

तो हमने तुम्हें भड़कती हुई आग से डरा दिया

15

لَا يَصْلَىٰهَآ إِلَّا ٱلْأَشْقَى

उसमें बस वही दाख़िल होगा जो बड़ा बदबख्त है

16

ٱلَّذِى كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ

जिसने झुठलाया और मुँह फेर लिया और जो बड़ा परहेज़गार है

17

وَسَيُجَنَّبُهَا ٱلْأَتْقَى

वह उससे बचा लिया जाएगा

18

ٱلَّذِى يُؤْتِى مَالَهُۥ يَتَزَكَّىٰ

जो अपना माल (ख़ुदा की राह) में देता है ताकि पाक हो जाए

19

وَمَا لِأَحَدٍ عِندَهُۥ مِن نِّعْمَةٍۢ تُجْزَىٰٓ

और लुत्फ ये है कि किसी का उस पर कोई एहसान नहीं जिसका उसे बदला दिया जाता है

20

إِلَّا ٱبْتِغَآءَ وَجْهِ رَبِّهِ ٱلْأَعْلَىٰ

बल्कि (वह तो) सिर्फ अपने आलीशान परवरदिगार की ख़ुशनूदी हासिल करने के लिए (देता है)

21

وَلَسَوْفَ يَرْضَىٰ

और वह अनक़रीब भी ख़ुश हो जाएगा

Ad-Dhuhaa
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلضُّحَىٰ

(ऐ रसूल) पहर दिन चढ़े की क़सम

2

وَٱلَّيْلِ إِذَا سَجَىٰ

और रात की जब (चीज़ों को) छुपा ले

3

مَا وَدَّعَكَ رَبُّكَ وَمَا قَلَىٰ

कि तुम्हारा परवरदिगार न तुमको छोड़ बैठा और (न तुमसे) नाराज़ हुआ

4

وَلَلْءَاخِرَةُ خَيْرٌۭ لَّكَ مِنَ ٱلْأُولَىٰ

और तुम्हारे वास्ते आख़ेरत दुनिया से यक़ीनी कहीं बेहतर है

5

وَلَسَوْفَ يُعْطِيكَ رَبُّكَ فَتَرْضَىٰٓ

और तुम्हारा परवरदिगार अनक़रीब इस क़दर अता करेगा कि तुम ख़ुश हो जाओ

6

أَلَمْ يَجِدْكَ يَتِيمًۭا فَـَٔاوَىٰ

क्या उसने तुम्हें यतीम पाकर (अबू तालिब की) पनाह न दी (ज़रूर दी)

7

وَوَجَدَكَ ضَآلًّۭا فَهَدَىٰ

और तुमको एहकाम से नावाकिफ़ देखा तो मंज़िले मक़सूद तक पहुँचा दिया

8

وَوَجَدَكَ عَآئِلًۭا فَأَغْنَىٰ

और तुमको तंगदस्त देखकर ग़नी कर दिया

9

فَأَمَّا ٱلْيَتِيمَ فَلَا تَقْهَرْ

तो तुम भी यतीम पर सितम न करना

10

وَأَمَّا ٱلسَّآئِلَ فَلَا تَنْهَرْ

माँगने वाले को झिड़की न देना

11

وَأَمَّا بِنِعْمَةِ رَبِّكَ فَحَدِّثْ

और अपने परवरदिगार की नेअमतों का ज़िक्र करते रहना

Ash-Sharh
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ أَلَمْ نَشْرَحْ لَكَ صَدْرَكَ

(ऐ रसूल) क्या हमने तुम्हारा सीना इल्म से कुशादा नहीं कर दिया (जरूर किया)

2

وَوَضَعْنَا عَنكَ وِزْرَكَ

और तुम पर से वह बोझ उतार दिया

3

ٱلَّذِىٓ أَنقَضَ ظَهْرَكَ

जिसने तुम्हारी कमर तोड़ रखी थी

4

وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ

और तुम्हारा ज़िक्र भी बुलन्द कर दिया

5

فَإِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًا

तो (हाँ) पस बेशक दुशवारी के साथ ही आसानी है

6

إِنَّ مَعَ ٱلْعُسْرِ يُسْرًۭا

यक़ीनन दुश्वारी के साथ आसानी है

7

فَإِذَا فَرَغْتَ فَٱنصَبْ

तो जब तुम फारिग़ हो जाओ तो मुक़र्रर कर दो

8

وَإِلَىٰ رَبِّكَ فَٱرْغَب

और फिर अपने परवरदिगार की तरफ रग़बत करो

At-Tin
1

بِّسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلتِّينِ وَٱلزَّيْتُونِ

इन्जीर और ज़ैतून की क़सम

2

وَطُورِ سِينِينَ

और तूर सीनीन की

3

وَهَٰذَا ٱلْبَلَدِ ٱلْأَمِينِ

और उस अमन वाले शहर (मक्का) की

4

لَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَٰنَ فِىٓ أَحْسَنِ تَقْوِيمٍۢ

कि हमने इन्सान बहुत अच्छे कैड़े का पैदा किया

5

ثُمَّ رَدَدْنَٰهُ أَسْفَلَ سَٰفِلِينَ

फिर हमने उसे (बूढ़ा करके रफ्ता रफ्ता) पस्त से पस्त हालत की तरफ फेर दिया

6

إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ فَلَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍۢ

मगर जो लोग ईमान लाए और अच्छे (अच्छे) काम करते रहे उनके लिए तो बे इन्तेहा अज्र व सवाब है

7

فَمَا يُكَذِّبُكَ بَعْدُ بِٱلدِّينِ

तो (ऐ रसूल) इन दलीलों के बाद तुमको (रोज़े) जज़ा के बारे में कौन झुठला सकता है

8

أَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَحْكَمِ ٱلْحَٰكِمِينَ

क्या ख़ुदा सबसे बड़ा हाकिम नहीं है (हाँ ज़रूर है)

Al-Alaq
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱقْرَأْ بِٱسْمِ رَبِّكَ ٱلَّذِى خَلَقَ

(ऐ रसूल) अपने परवरदिगार का नाम लेकर पढ़ो जिसने हर (चीज़ को) पैदा किया

2

خَلَقَ ٱلْإِنسَٰنَ مِنْ عَلَقٍ

उस ने इन्सान को जमे हुए ख़ून से पैदा किया पढ़ो

3

ٱقْرَأْ وَرَبُّكَ ٱلْأَكْرَمُ

और तुम्हारा परवरदिगार बड़ा क़रीम है

4

ٱلَّذِى عَلَّمَ بِٱلْقَلَمِ

जिसने क़लम के ज़रिए तालीम दी

5

عَلَّمَ ٱلْإِنسَٰنَ مَا لَمْ يَعْلَمْ

उसीने इन्सान को वह बातें बतायीं जिनको वह कुछ जानता ही न था

6

كَلَّآ إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لَيَطْغَىٰٓ

सुन रखो बेशक इन्सान जो अपने को ग़नी देखता है

7

أَن رَّءَاهُ ٱسْتَغْنَىٰٓ

तो सरकश हो जाता है

8

إِنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ ٱلرُّجْعَىٰٓ

बेशक तुम्हारे परवरदिगार की तरफ (सबको) पलटना है

9

أَرَءَيْتَ ٱلَّذِى يَنْهَىٰ

भला तुमने उस शख़्श को भी देखा

10

عَبْدًا إِذَا صَلَّىٰٓ

जो एक बन्दे को जब वह नमाज़ पढ़ता है तो वह रोकता है

11

أَرَءَيْتَ إِن كَانَ عَلَى ٱلْهُدَىٰٓ

भला देखो तो कि अगर ये राहे रास्त पर हो या परहेज़गारी का हुक्म करे

12

أَوْ أَمَرَ بِٱلتَّقْوَىٰٓ

(तो रोकना कैसा)

13

أَرَءَيْتَ إِن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰٓ

भला देखो तो कि अगर उसने (सच्चे को) झुठला दिया और (उसने) मुँह फेरा

14

أَلَمْ يَعْلَم بِأَنَّ ٱللَّهَ يَرَىٰ

(तो नतीजा क्या होगा) क्या उसको ये मालूम नहीं कि ख़ुदा यक़ीनन देख रहा है

15

كَلَّا لَئِن لَّمْ يَنتَهِ لَنَسْفَعًۢا بِٱلنَّاصِيَةِ

देखो अगर वह बाज़ न आएगा तो हम परेशानी के पट्टे पकड़ के घसीटेंगे

16

نَاصِيَةٍۢ كَٰذِبَةٍ خَاطِئَةٍۢ

झूठे ख़तावार की पेशानी के पट्टे

17

فَلْيَدْعُ نَادِيَهُۥ

तो वह अपने याराने जलसा को बुलाए हम भी जल्लाद फ़रिश्ते को बुलाएँगे

18

سَنَدْعُ ٱلزَّبَانِيَةَ

(ऐ रसूल) देखो हरगिज़ उनका कहना न मानना

19

كَلَّا لَا تُطِعْهُ وَٱسْجُدْ وَٱقْتَرِب ۩

और सजदे करते रहो और कुर्ब हासिल करो (19) (सजदा)

Al-Qadr
1

بِّسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِنَّآ أَنزَلْنَٰهُ فِى لَيْلَةِ ٱلْقَدْرِ

हमने (इस कुरान) को शबे क़द्र में नाज़िल (करना शुरू) किया

2

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا لَيْلَةُ ٱلْقَدْرِ

और तुमको क्या मालूम शबे क़द्र क्या है

3

لَيْلَةُ ٱلْقَدْرِ خَيْرٌۭ مِّنْ أَلْفِ شَهْرٍۢ

शबे क़द्र (मरतबा और अमल में) हज़ार महीनो से बेहतर है

4

تَنَزَّلُ ٱلْمَلَٰٓئِكَةُ وَٱلرُّوحُ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِم مِّن كُلِّ أَمْرٍۢ

इस (रात) में फ़रिश्ते और जिबरील (साल भर की) हर बात का हुक्म लेकर अपने परवरदिगार के हुक्म से नाज़िल होते हैं

5

سَلَٰمٌ هِىَ حَتَّىٰ مَطْلَعِ ٱلْفَجْرِ

ये रात सुबह के तुलूअ होने तक (अज़सरतापा) सलामती है

Al-Bayyina
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ لَمْ يَكُنِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَٰبِ وَٱلْمُشْرِكِينَ مُنفَكِّينَ حَتَّىٰ تَأْتِيَهُمُ ٱلْبَيِّنَةُ

अहले किताब और मुशरिकों से जो लोग काफिर थे जब तक कि उनके पास खुली हुई दलीलें न पहुँचे वह (अपने कुफ्र से) बाज़ आने वाले न थे

2

رَسُولٌۭ مِّنَ ٱللَّهِ يَتْلُوا۟ صُحُفًۭا مُّطَهَّرَةًۭ

(यानि) ख़ुदा के रसूल जो पाक औराक़ पढ़ते हैं (आए और)

3

فِيهَا كُتُبٌۭ قَيِّمَةٌۭ

उनमें (जो) पुरज़ोर और दरूस्त बातें लिखी हुई हैं (सुनाये)

4

وَمَا تَفَرَّقَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَٰبَ إِلَّا مِنۢ بَعْدِ مَا جَآءَتْهُمُ ٱلْبَيِّنَةُ

अहले किताब मुताफ़र्रिक़ हुए भी तो जब उनके पास खुली हुई दलील आ चुकी

5

وَمَآ أُمِرُوٓا۟ إِلَّا لِيَعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ حُنَفَآءَ وَيُقِيمُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤْتُوا۟ ٱلزَّكَوٰةَ ۚ وَذَٰلِكَ دِينُ ٱلْقَيِّمَةِ

(तब) और उन्हें तो बस ये हुक्म दिया गया था कि निरा ख़ुरा उसी का एतक़ाद रख के बातिल से कतरा के ख़ुदा की इबादत करे और पाबन्दी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्चा दीन है

6

إِنَّ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِنْ أَهْلِ ٱلْكِتَٰبِ وَٱلْمُشْرِكِينَ فِى نَارِ جَهَنَّمَ خَٰلِدِينَ فِيهَآ ۚ أُو۟لَٰٓئِكَ هُمْ شَرُّ ٱلْبَرِيَّةِ

बेशक अहले किताब और मुशरेकीन से जो लोग (अब तक) काफ़िर हैं वह दोज़ख़ की आग में (होंगे) हमेशा उसी में रहेंगे यही लोग बदतरीन ख़लाएक़ हैं

7

إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ أُو۟لَٰٓئِكَ هُمْ خَيْرُ ٱلْبَرِيَّةِ

बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे काम करते रहे यही लोग बेहतरीन ख़लाएक़ हैं

8

جَزَآؤُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ جَنَّٰتُ عَدْنٍۢ تَجْرِى مِن تَحْتِهَا ٱلْأَنْهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًۭا ۖ رَّضِىَ ٱللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا۟ عَنْهُ ۚ ذَٰلِكَ لِمَنْ خَشِىَ رَبَّهُۥ

उनकी जज़ा उनके परवरदिगार के यहाँ हमेशा रहने (सहने) के बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें जारी हैं और वह आबादुल आबाद हमेशा उसी में रहेंगे ख़ुदा उनसे राज़ी और वह ख़ुदा से ख़ुश ये (जज़ा) ख़ास उस शख़्श की है जो अपने परवरदिगार से डरे

Az-Zalzala
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِذَا زُلْزِلَتِ ٱلْأَرْضُ زِلْزَالَهَا

जब ज़मीन बड़े ज़ोरों के साथ ज़लज़ले में आ जाएगी

2

وَأَخْرَجَتِ ٱلْأَرْضُ أَثْقَالَهَا

और ज़मीन अपने अन्दर के बोझे (मादनयात मुर्दे वग़ैरह) निकाल डालेगी

3

وَقَالَ ٱلْإِنسَٰنُ مَا لَهَا

और एक इन्सान कहेगा कि उसको क्या हो गया है

4

يَوْمَئِذٍۢ تُحَدِّثُ أَخْبَارَهَا

उस रोज़ वह अपने सब हालात बयान कर देगी

5

بِأَنَّ رَبَّكَ أَوْحَىٰ لَهَا

क्योंकि तुम्हारे परवरदिगार ने उसको हुक्म दिया होगा

6

يَوْمَئِذٍۢ يَصْدُرُ ٱلنَّاسُ أَشْتَاتًۭا لِّيُرَوْا۟ أَعْمَٰلَهُمْ

उस दिन लोग गिरोह गिरोह (अपनी कब्रों से) निकलेंगे ताकि अपने आमाल को देखे

7

فَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ خَيْرًۭا يَرَهُۥ

तो जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर नेकी की वह उसे देख लेगा

8

وَمَن يَعْمَلْ مِثْقَالَ ذَرَّةٍۢ شَرًّۭا يَرَهُۥ

और जिस शख्स ने ज़र्रा बराबर बदी की है तो उसे देख लेगा

Al-Aadiyaat
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلْعَٰدِيَٰتِ ضَبْحًۭا

(ग़ाज़ियों के) सरपट दौड़ने वाले घोड़ो की क़सम

2

فَٱلْمُورِيَٰتِ قَدْحًۭا

जो नथनों से फ़रराटे लेते हैं

3

فَٱلْمُغِيرَٰتِ صُبْحًۭا

फिर पत्थर पर टाप मारकर चिंगारियाँ निकालते हैं फिर सुबह को छापा मारते हैं

4

فَأَثَرْنَ بِهِۦ نَقْعًۭا

(तो दौड़ धूप से) बुलन्द कर देते हैं

5

فَوَسَطْنَ بِهِۦ جَمْعًا

फिर उस वक्त (दुश्मन के) दिल में घुस जाते हैं

6

إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لِرَبِّهِۦ لَكَنُودٌۭ

(ग़रज़ क़सम है) कि बेशक इन्सान अपने परवरदिगार का नाशुक्रा है

7

وَإِنَّهُۥ عَلَىٰ ذَٰلِكَ لَشَهِيدٌۭ

और यक़ीनी ख़ुदा भी उससे वाक़िफ़ है

8

وَإِنَّهُۥ لِحُبِّ ٱلْخَيْرِ لَشَدِيدٌ

और बेशक वह माल का सख्त हरीस है

9

۞ أَفَلَا يَعْلَمُ إِذَا بُعْثِرَ مَا فِى ٱلْقُبُورِ

तो क्या वह ये नहीं जानता कि जब मुर्दे क़ब्रों से निकाले जाएँगे

10

وَحُصِّلَ مَا فِى ٱلصُّدُورِ

और दिलों के भेद ज़ाहिर कर दिए जाएँगे

11

إِنَّ رَبَّهُم بِهِمْ يَوْمَئِذٍۢ لَّخَبِيرٌۢ

बेशक उस दिन उनका परवरदिगार उनसे ख़ूब वाक़िफ़ होगा

Al-Qaari'a
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ ٱلْقَارِعَةُ

खड़खड़ाने वाली

2

مَا ٱلْقَارِعَةُ

वह खड़खड़ाने वाली क्या है

3

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْقَارِعَةُ

और तुम को क्या मालूम कि वह खड़खड़ाने वाली क्या है

4

يَوْمَ يَكُونُ ٱلنَّاسُ كَٱلْفَرَاشِ ٱلْمَبْثُوثِ

जिस दिन लोग (मैदाने हश्र में) टिड्डियों की तरह फैले होंगे

5

وَتَكُونُ ٱلْجِبَالُ كَٱلْعِهْنِ ٱلْمَنفُوشِ

और पहाड़ धुनकी हुई रूई के से हो जाएँगे

6

فَأَمَّا مَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ

तो जिसके (नेक आमाल) के पल्ले भारी होंगे

7

فَهُوَ فِى عِيشَةٍۢ رَّاضِيَةٍۢ

वह मन भाते ऐश में होंगे

8

وَأَمَّا مَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ

और जिनके आमाल के पल्ले हल्के होंगे

9

فَأُمُّهُۥ هَاوِيَةٌۭ

तो उनका ठिकाना न रहा

10

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا هِيَهْ

और तुमको क्या मालूम हाविया क्या है

11

نَارٌ حَامِيَةٌۢ

वह दहकती हुई आग है

At-Takaathur
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ أَلْهَىٰكُمُ ٱلتَّكَاثُرُ

कुल व माल की बहुतायत ने तुम लोगों को ग़ाफ़िल रखा

2

حَتَّىٰ زُرْتُمُ ٱلْمَقَابِرَ

यहाँ तक कि तुम लोगों ने कब्रें देखी (मर गए)

3

كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَ

देखो तुमको अनक़रीब ही मालुम हो जाएगा

4

ثُمَّ كَلَّا سَوْفَ تَعْلَمُونَ

फिर देखो तुम्हें अनक़रीब ही मालूम हो जाएगा

5

كَلَّا لَوْ تَعْلَمُونَ عِلْمَ ٱلْيَقِينِ

देखो अगर तुमको यक़ीनी तौर पर मालूम होता (तो हरगिज़ ग़ाफिल न होते)

6

لَتَرَوُنَّ ٱلْجَحِيمَ

तुम लोग ज़रूर दोज़ख़ को देखोगे

7

ثُمَّ لَتَرَوُنَّهَا عَيْنَ ٱلْيَقِينِ

फिर तुम लोग यक़ीनी देखना देखोगे

8

ثُمَّ لَتُسْـَٔلُنَّ يَوْمَئِذٍ عَنِ ٱلنَّعِيمِ

फिर तुमसे नेअमतों के बारें ज़रूर बाज़ पुर्स की जाएगी

Al-Asr
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَٱلْعَصْرِ

नमाज़े अस्र की क़सम

2

إِنَّ ٱلْإِنسَٰنَ لَفِى خُسْرٍ

बेशक इन्सान घाटे में है

3

إِلَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ وَعَمِلُوا۟ ٱلصَّٰلِحَٰتِ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلْحَقِّ وَتَوَاصَوْا۟ بِٱلصَّبْرِ

मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे

Al-Humaza
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ وَيْلٌۭ لِّكُلِّ هُمَزَةٍۢ لُّمَزَةٍ

हर ताना देने वाले चुग़लख़ोर की ख़राबी है

2

ٱلَّذِى جَمَعَ مَالًۭا وَعَدَّدَهُۥ

जो माल को जमा करता है और गिन गिन कर रखता है

3

يَحْسَبُ أَنَّ مَالَهُۥٓ أَخْلَدَهُۥ

वह समझता है कि उसका माल उसे हमेशा ज़िन्दा बाक़ी रखेगा

4

كَلَّا ۖ لَيُنۢبَذَنَّ فِى ٱلْحُطَمَةِ

हरगिज़ नहीं वह तो ज़रूर हुतमा में डाला जाएगा

5

وَمَآ أَدْرَىٰكَ مَا ٱلْحُطَمَةُ

और तुमको क्या मालूम हतमा क्या है

6

نَارُ ٱللَّهِ ٱلْمُوقَدَةُ

वह ख़ुदा की भड़काई हुई आग है जो (तलवे से लगी तो) दिलों तक चढ़ जाएगी

7

ٱلَّتِى تَطَّلِعُ عَلَى ٱلْأَفْـِٔدَةِ

ये लोग आग के लम्बे सुतूनो

8

إِنَّهَا عَلَيْهِم مُّؤْصَدَةٌۭ

में डाल कर बन्द कर दिए

9

فِى عَمَدٍۢ مُّمَدَّدَةٍۭ

जाएँगे

Al-Fil
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ أَلَمْ تَرَ كَيْفَ فَعَلَ رَبُّكَ بِأَصْحَٰبِ ٱلْفِيلِ

ऐ रसूल क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे परवरदिगार ने हाथी वालों के साथ क्या किया

2

أَلَمْ يَجْعَلْ كَيْدَهُمْ فِى تَضْلِيلٍۢ

क्या उसने उनकी तमाम तद्बीरें ग़लत नहीं कर दीं (ज़रूर)

3

وَأَرْسَلَ عَلَيْهِمْ طَيْرًا أَبَابِيلَ

और उन पर झुन्ड की झुन्ड चिड़ियाँ भेज दीं

4

تَرْمِيهِم بِحِجَارَةٍۢ مِّن سِجِّيلٍۢ

जो उन पर खरन्जों की कंकरियाँ फेकती थीं

5

فَجَعَلَهُمْ كَعَصْفٍۢ مَّأْكُولٍۭ

तो उन्हें चबाए हुए भूस की (तबाह) कर दिया

Quraish
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ لِإِيلَٰفِ قُرَيْشٍ

चूँकि क़ुरैश को जाड़े और गर्मी के सफ़र से मानूस कर दिया है

2

إِۦلَٰفِهِمْ رِحْلَةَ ٱلشِّتَآءِ وَٱلصَّيْفِ

तो उनको मानूस कर देने की वजह से

3

فَلْيَعْبُدُوا۟ رَبَّ هَٰذَا ٱلْبَيْتِ

इस घर (काबा) के मालिक की इबादत करनी चाहिए

4

ٱلَّذِىٓ أَطْعَمَهُم مِّن جُوعٍۢ وَءَامَنَهُم مِّنْ خَوْفٍۭ

जिसने उनको भूख में खाना दिया और उनको खौफ़ से अमन अता किया

Al-Maa'un
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ أَرَءَيْتَ ٱلَّذِى يُكَذِّبُ بِٱلدِّينِ

क्या तुमने उस शख़्श को भी देखा है जो रोज़ जज़ा को झुठलाता है

2

فَذَٰلِكَ ٱلَّذِى يَدُعُّ ٱلْيَتِيمَ

ये तो वही (कम्बख्त) है जो यतीम को धक्के देता है

3

وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ

और मोहताजों को खिलाने के लिए (लोगों को) आमादा नहीं करता

4

فَوَيْلٌۭ لِّلْمُصَلِّينَ

तो उन नमाज़ियों की तबाही है

5

ٱلَّذِينَ هُمْ عَن صَلَاتِهِمْ سَاهُونَ

जो अपनी नमाज़ से ग़ाफिल रहते हैं

6

ٱلَّذِينَ هُمْ يُرَآءُونَ

जो दिखाने के वास्ते करते हैं

7

وَيَمْنَعُونَ ٱلْمَاعُونَ

और रोज़मर्रा की मालूली चीज़ें भी आरियत नहीं देते

Al-Kawthar
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِنَّآ أَعْطَيْنَٰكَ ٱلْكَوْثَرَ

(ऐ रसूल) हमनें तुमको को कौसर अता किया,

2

فَصَلِّ لِرَبِّكَ وَٱنْحَرْ

तो तुम अपने परवरदिगार की नमाज़ पढ़ा करो

3

إِنَّ شَانِئَكَ هُوَ ٱلْأَبْتَرُ

और क़ुर्बानी दिया करो बेशक तुम्हारा दुश्मन बे औलाद रहेगा

Al-Kaafiroon
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ يَٰٓأَيُّهَا ٱلْكَٰفِرُونَ

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ काफिरों

2

لَآ أَعْبُدُ مَا تَعْبُدُونَ

तुम जिन चीज़ों को पूजते हो, मैं उनको नहीं पूजता

3

وَلَآ أَنتُمْ عَٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ

और जिस (ख़ुदा) की मैं इबादत करता हूँ उसकी तुम इबादत नहीं करते

4

وَلَآ أَنَا۠ عَابِدٌۭ مَّا عَبَدتُّمْ

और जिन्हें तुम पूजते हो मैं उनका पूजने वाला नहीं

5

وَلَآ أَنتُمْ عَٰبِدُونَ مَآ أَعْبُدُ

और जिसकी मैं इबादत करता हूँ उसकी तुम इबादत करने वाले नहीं

6

لَكُمْ دِينُكُمْ وَلِىَ دِينِ

तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन

An-Nasr
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ إِذَا جَآءَ نَصْرُ ٱللَّهِ وَٱلْفَتْحُ

ऐ रसूल जब ख़ुदा की मदद आ पहँचेगी

2

وَرَأَيْتَ ٱلنَّاسَ يَدْخُلُونَ فِى دِينِ ٱللَّهِ أَفْوَاجًۭا

और फतेह (मक्का) हो जाएगी और तुम लोगों को देखोगे कि गोल के गोल ख़ुदा के दीन में दाख़िल हो रहे हैं

3

فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَٱسْتَغْفِرْهُ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ تَوَّابًۢا

तो तुम अपने परवरदिगार की तारीफ़ के साथ तसबीह करना और उसी से मग़फेरत की दुआ माँगना वह बेशक बड़ा माफ़ करने वाला है

Al-Masad
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ تَبَّتْ يَدَآ أَبِى لَهَبٍۢ وَتَبَّ

अबु लहब के हाथ टूट जाएँ और वह ख़ुद सत्यानास हो जाए

2

مَآ أَغْنَىٰ عَنْهُ مَالُهُۥ وَمَا كَسَبَ

(आख़िर) न उसका माल ही उसके हाथ आया और (न) उसने कमाया

3

سَيَصْلَىٰ نَارًۭا ذَاتَ لَهَبٍۢ

वह बहुत भड़कती हुई आग में दाख़िल होगा

4

وَٱمْرَأَتُهُۥ حَمَّالَةَ ٱلْحَطَبِ

और उसकी जोरू भी जो सर पर ईंधन उठाए फिरती है

5

فِى جِيدِهَا حَبْلٌۭ مِّن مَّسَدٍۭ

और उसके गले में बटी हुई रस्सी बँधी है

Al-Ikhlaas
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ هُوَ ٱللَّهُ أَحَدٌ

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ख़ुदा एक है

2

ٱللَّهُ ٱلصَّمَدُ

ख़ुदा बरहक़ बेनियाज़ है

3

لَمْ يَلِدْ وَلَمْ يُولَدْ

न उसने किसी को जना न उसको किसी ने जना,

4

وَلَمْ يَكُن لَّهُۥ كُفُوًا أَحَدٌۢ

और उसका कोई हमसर नहीं

Al-Falaq
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلْفَلَقِ

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं सुबह के मालिक की

2

مِن شَرِّ مَا خَلَقَ

हर चीज़ की बुराई से जो उसने पैदा की पनाह माँगता हूँ

3

وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ

और अंधेरीरात की बुराई से जब उसका अंधेरा छा जाए

4

وَمِن شَرِّ ٱلنَّفَّٰثَٰتِ فِى ٱلْعُقَدِ

और गन्डों पर फूँकने वालियों की बुराई से

5

وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ

(जब फूँके) और हसद करने वाले की बुराई से

An-Naas
1

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ ٱلنَّاسِ

(ऐ रसूल) तुम कह दो मैं लोगों के परवरदिगार

2

مَلِكِ ٱلنَّاسِ

लोगों के बादशाह

3

إِلَٰهِ ٱلنَّاسِ

लोगों के माबूद की (शैतानी)

4

مِن شَرِّ ٱلْوَسْوَاسِ ٱلْخَنَّاسِ

वसवसे की बुराई से पनाह माँगता हूँ

5

ٱلَّذِى يُوَسْوِسُ فِى صُدُورِ ٱلنَّاسِ

जो (ख़ुदा के नाम से) पीछे हट जाता है जो लोगों के दिलों में वसवसे डाला करता है

6

مِنَ ٱلْجِنَّةِ وَٱلنَّاسِ

जिन्नात में से ख्वाह आदमियों में से

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Disclaimer: This content is provided for general informational and educational purposes. Prayer timings and calendar dates are calculated values that may differ slightly from your local mosque or moon-sighting committee. For religious rulings, please consult a qualified scholar.

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